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मन की स्थितियां

चित्त - मन बुद्धि और अहंकार के समन्वय को कहते है .  कहीं कही अन्तःच्तुष्टय शब्द का भी उपयोग किया जाता है जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को कहते है . इसी को अंतःकरण भी कहते है . मन के द्वारा संकल्प-विकल्प किया जाता है। सकारात्मक विचार संकल्प और विपरीत विचार विकल्प कहलाता है . बुद्धि द्वारा निश्चय किया जाता है, चित्त द्वारा अवधारणा अर्थात एक जगह ठहरना होता है . अहंकार द्वारा मै हूँ या मै करता हूँ का अभिमान प्रकट होता है। बुद्धि जब विकार युक्त होती है तो अहंकार का ग्रहण करती है . मन का स्थान गले का ऊपरी भाग, बुद्धि का स्थान मुख, चित्त का स्थान नाभि और अहंकार का स्थान हृदय है।कर्मो के आधार पर चित्त की निम्नलिखित स्थितियां होती है - १. क्षिप्त , २. मूढ़ ३. विक्षिप्त ४. एकाग्र ५. निरुद्ध

१. क्षिप्त - मन  विविध विषयों में ही उलझा रहता है.  इश्वर विषयक ज्ञान के लिए कोई बौध्दिक शक्ति और इच्छा दोनों ही नहीं होती है . रजो गुण कि प्रधानता होने के कारण सदैव एक वस्तु से दूसरी वस्तु में भटकता रहता है . 

२. मूढ़ - क्रोध, निद्रा , तन्द्रा , आलस्य , मूर्छा आदि अवस्थाओं में जीवात्मा को जब विशेष ज्ञान नहीं होता अथवा विशेष ज्ञान नहीं कर पाता है. इस अवस्था में तमोगुण प्रधान होता है . इन्द्रियों के विषयों पर मोहित होने के कारण तत्व चिंतन की ओर ध्यान ही नहीं जाता . क्रोध इत्यादि के वश में कार्य करता है. धर्म अधर्म का विवेक नहीं रहता है  .

३. विक्षिप्त - जिस अवस्था में मनुष्य किसी विशेष विषय पर अपने चित्त को एकाग्र करने का प्रयास करता है तो चित्त में कुछ एकाग्रता आती है ! परन्तु वह स्थिति किसी बाधक कारण से भंग हो जाती है, चित्त कभी कभी स्थिर कभी कभी अस्थिर होता है, उसको विक्षिप्त अवस्था कहते हैं ! कभी कभी सत्व गुण का प्रभाव आता है. 

४. एकाग्र - जिस अवस्था में योगाभ्यासी विवेक, वैराग्य, और अभ्यास से अपने चित्त को योग के लिए अपेक्षित किसी एक विषय अथवा वृत्ति  में अधिकारपूर्वक बहुत काल तक स्थिर कर लेता है , उसको एकाग्र कहते हैं ! स्वप्न में भी स्थिरता बनी रहती है . इसमें सत्व गुण का आधिक्य रहता है. 

५. निरुद्ध - मन एकाग्र होकर स्वयं को भूल जाता है , उस अवस्था में चित्त कि समस्त वृतियों का सत्व गुण के आधिक्य से निरोध हो जाता है ! इसको निरुद्ध अवस्था कहते हैं !

चित्त की अनुभूति उसके क्रिया कलापों अर्थात कार्य करने के तरीके से होती है जिसे वृत्ति कहते है . वृत्ति के कारण ही सुख या दुःख का अनुभव होता है किन्तु यह सदेव सत्य को आवृत्त करती है . जब तक वृत्तियाँ रहती  है , चित्त क्रियाशील है , ऐसा समझना चाहिए .  चित्त की वृत्तियाँ  प्रमुखतया पाँच हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। 

(1) प्रमाण :  जानने का उपाय प्रमाण कहलाता हैं . प्रमाण के तीन प्रकार है- प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सीधे जो अनुभव होता है वह प्रत्यक्ष प्रमाण है .  जब किसी वस्तु की सत्ता का ज्ञान अन्य वस्तु के ज्ञान द्वारा प्राप्त हो वह अनुमान प्रमाण कहलाता है. पूर्वज्ञान के पश्चात होने वाला ज्ञान अनुमान है अर्थात जो प्रत्यक्ष पर आधारित हो . जब किसी तथ्य की सूचना शब्द अथवा लिखित माध्यम से प्राप्त होती है तो उसे शब्द प्रमाण कहते है . 
(2) विपर्यय : गलत आभास को मिथ्याज्ञान अर्थात विपर्यय कहते हैं। इसके अंतर्गत संशय या भ्रम को ले सकते हैं। जैसे रस्सी को देखकर हम उसे सांप समझने की भूल करते रहें। विपर्यय अविद्या, अस्मिता,राग, द्वेष और अभिनिवेश इन पांच क्लेशों से युक्त है.
(3) विकल्प : जिसके विषय में असमंजस हो और उसकी मन से कल्पना की जाए उसको विकल्प कहते है । शब्दज्ञान अर्थात् सुनी-सुनाई बातों पर पदार्थ की कल्पना अर्थात अयथार्थ चिंता करना ही विकल्प वृत्ति है. इसमें  व्यक्ति वर्तमान से अलग होकर अपने एक संसार का निर्माण कर  दुखों को निर्मित कर लेता है।
(4) निद्रा : विषयागत बोध का अभाव निद्रा है। ‍नींद में भी चित्त की समस्त वृत्तियां सक्रिय रहती है तभी अच्छे और बुरे स्वप्न आते हैं।
(5) स्मृति : संस्कारजन्य ज्ञान है, जिन अनुभूतियों को हम भूल नहीं पाते हैं या अनुभव में आए विषयों का बार बार स्फुरित होना स्मृति है । अच्छी या बुरी घटनाओं की स्मृति रहने से क्लेश उत्पन्न होते हैं।

प्रथम  दो वृत्तियों का सम्बन्ध वाह्य परिस्थितियों से है और अंतिम तीन का आतंरिक . मन इधर- उधर स्वाभवतः इन्ही वृत्तियों में तब तक भटकता रहता है, जब तक कि उसको प्रशिक्षित नहीं किया जाए . वृत्तियों के रहते सत्य को जाना नहीं जा सकता इसलिए अनका विलय करना अनिवार्य है . वृत्तियों के निरोध  के बिना ईश्वर सम्बन्धी विषयों को सम्यक रूप से ग्रहण नहीं किया जा सकता  . इसके लिए शरीर और मन दोनों का प्रशिक्षण अनिवार्य है .  वृत्तियाँ पूर्व संस्कारों और वर्तमान में ग्रहण किये जाने वाले विषयों से प्रभावित होती है. यम, नियम, आसन, प्रत्याहार शारीरिक प्रशिक्षण का अंग है जो कि वर्तमान वृत्तियों को संतुलित करती है . मन का प्रशिक्षण  प्राणायाम, धारणा और ध्यान के द्वारा किया जाता है, इससे पूर्व जन्म की वृत्तियाँ रूपांतरित होती है . 

साधक जब साधना के मार्ग में प्रवेश करता है और मन को एकाग्र करने का प्रयास करता है तो उत्साह से आरम्भ करता है और शांति का अनुभव अधिकांशतः साधकों को होता है . प्रथम अवस्था सहज और प्रेरणादायक प्रतीत होती है किन्तु  मन की स्थिति हमेशा एक सी नहीं रहती. जब शरीर और मन को स्थिर करने का प्रयास करते है तो निम्नलिखित बाधाएं समक्ष आती है -

  •  व्याधि -  यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की हो सकती है. यदि दोनों रूप से स्वस्थ्य नहीं होंगे अधिक दूर नहीं चल पायेंगे . प्राण ऊर्जा जहा भी विकार होता है वहां एकत्र होकर अवरूद्ध हो जाती है .  
  • स्त्यान - चित्त की अकर्मण्यता - इसमें व्यक्ति सब प्रकार की बाते अवश्य करता है किन्तु क्रियान्वय के लिए प्रयत्नशील नहीं हो पाता है।   
  • संशय / संदेह - इसके कारण दृढ़ता में कमी होती है।  
  • प्रमाद - जान बूझकर व्यर्थ के कामो में पड़ना और असावधानी के साथ कार्य करना 
  • आलस - शरीर व मन में एक प्रकार का भारीपन आ जाने से योग साधना नहीं कर पाना.
  • अविरती  - अच्छी अथवा बुरी बातों का चिंतन 
  • भ्रांतिदर्शन - वास्तविकता से परे अपने मन के अनुसार अर्थ निकालना
  • अलब्धभूमिकत्व - फल की प्राप्ति नहीं दिखने पर सही कार्य को छोड़ देना अर्थात सतत प्रयास नहीं करना 
  • अनवस्थितत्व -  अगली अवस्था तक पहुंचने अर्थात उन्नति होने पर भी मन स्थिर न रहना, किसी एक स्थान या कार्य में ज्यादा देर मन नहीं लगना ही अनवस्थितत्व है। यह भी मन की चंचलता के कारण उत्पन्न विकृति है। 

इन सब बाधाओं के लक्षण इन रूपों में व्यक्त होते है - दुख, निराशा, कंपकंपी और अनियमित श्वसन 
रोग, अकर्मण्यता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, विषयासक्ति, भ्रान्ति, उपलब्धि न होने से उपजी दुर्बलता और अस्थिरता वे बाधाएँ हैं, जो मन में विक्षेप लाती हैं। ये सभी विक्षेप मंत्र जप से समाप्त हो जाते हैं। 

मन को एकाग्र करना अत्यंत दुष्कर कार्य है . यह बार बार विचलित होता रहता है और विभिन्न विषयों की ओर भटकता रहता है . मन प्रकृति से उत्पन्न हुआ है , इसलिए वह प्रकृति अर्थात माया से अधिक प्रभावित होता है । मन एक है और वह एक समय में, एक ही विषय को ग्रहण तथा अनुभव करता है यही कारण है कि संकल्प के द्वारा उसको एक लक्ष्य पर टिकाने का बारम्बार अभ्यास मन की चंचलता को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कुंजी है. एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बार बार प्रयत्न करना अभ्यास है . अभ्यास तभी सफल होता है जब लम्बे समय तक दृढ संकल्प और समर्पण के साथ करते है .  बहुत अधिक चंचल और विशाल वृत्तियाँ होने के कारण इसको धीरे धीरे प्रशिक्षित किया जाता है. प्रशिक्षण के विभिन्न चरणों में  मन की स्थिति अलग अलग इस प्रकार विकसित होती है -

सबसे पहले समस्त घटनाओं, समस्याओं, विचारों और भावनाओं से स्वयं को दूर करने का प्रयास किया जाता है और मन को एक विषय पर टिकाया जाता है .इससे ऊर्जा का व्यर्थ का वाह्य क्षय रुक जाता है  यह एकाग्रता की प्राप्ति के लिए प्रथम चरण है .इस चरण में ध्यान बहुत  बार भंग होता है और मन में विक्षेप अधिक होता है . 
द्वितीय चरण में मन को बार बार विषयों से खीचकर वापस शुद्ध विषय / गुरु/ इश्वर/मन्त्र  पर टिकाने का अभ्यास किया जाता है . इस स्थिति में मन की स्थिर होने की प्रवृत्ति थोड़ी सी ठीक होती है . आलस्य इत्यादि में कमी आती है और दिशा निर्देशों का पालन करने के लिए मन प्रवृत्त होता है . अपनी भावनाओं और इच्छाओं को देखने की क्षमता आती है . 

निरंतर अभ्यास के फलस्वरूप जब तृतीय चरण में पहुचते है तो आत्मविश्वास में और वृद्धि होती है . मन में विक्षेप तो होता है किन्तु  उसके लिए दृष्टा का भाव जागृत होता है . जिसके कारण मन को अपने विषय पर केन्द्रित करना पहले की तुलना में अधिक सहज होता है . इसके पश्चात चतुर्थ चरण में प्रवेश होता है . इस अवस्था में मन के भटकने की चिंता नहीं रहती है. यद्यपि वह भटकता तो है किन्तु उससे अधिक सही चीजों के करने पर ध्यान अधिक रहता है और मन के विचलन की चिंता नहीं रहती है . 

पांचवे चरण  में कभी कभी आनंद की अनुभूति होती है किन्तु कुछ अनुभव भ्रम भी उत्पन्न कर सकते है .  मन में स्थिरता की वृद्धि होती है किन्तु भ्रमों से मुक्त नहीं होता है . छठे चरण में पहुच कर मन में थोड़ी स्पष्टता और बढती है . करने के लिए उत्साह में वृद्धि होती है. 
इसके अगले चरण में पहुचकर एकाग्रता में वृद्धि होती है और मन की व्याकुलता में बहुत कमी आती है . आठवे चरण में पहुचकर मन की स्पष्टता और जागृति की स्थिति अधिक प्रत्यक्ष होने लगती है . इस स्थिति में निरंतर अभ्यास के पश्चात ध्यान की अंतिम स्थिति में पहुच जाते है. इस स्थिति में मन बिलकुल स्थिर, सशक्त और आनंदमयी  हो जाता है . 

साधना के समय दो शक्तिया प्रभावी होती है, पहला कर्म और दूसरा विकर्म। कर्म वह क्रियाये होती है जो इश्वर की ओर प्रवृत्त करती है और विकर्म संसार की ओर खींचता है . विकर्म शक्ति शब्द स्पर्श आदि में से कोई एक विषय को मन में  जागृत करके आत्मा के  प्रकाश को आवृत कर देता है। फिर मन उस विषय को आधार लेकर , उससे सम्बंधित ही  कर्म करके विकर्म अर्थात संसार  के बंधन में फस जाता है। जब हम ज्ञान और वैराग्य के साथ धैर्यपूर्वक नियमित अभ्यास करते है, तो विकर्म के प्रभाव को क्षीण कर सकते  है। 

जो पूर्ण विश्वास के साथ केवल गुरु की आज्ञा का पालन करते है, उन्हीको कर्म और विकर्म का भेद पता चलता है। 
निरंतर आज्ञा पालन के बाद जब आत्मा ज्ञान, वैराग्य और भक्ति उत्त्पन होती है, जिसमे सभी पुराने कर्म भस्म हो जाते है और मुक्ति की प्राप्ति होती है ।